कौन कहता है मोहब्बत में धर्म का कोई मतलब नही होता उसका-मेरा मजहब एक होता तो साथ मे दफ्न होता मेरे बराबर में कब्र ही है तो उसे बेवफा मत समझ लेनाउसकी अस्थियां अब तक कोई दरिया बहा ले गया होगा
गैर मजहबी ना होता तो हस्र में मेरे साथ खड़ा होता एक ही में तराजू मेरा-उसका हिसाब किताब होता मजहबी नाफरमानी पर जा रहा हूँ मैं जहन्नुम सोच रहा हूँ कि क्या उसे स्वर्ग मिला होगा?
कैसे सोचु कि वो मुझसे मिलने तो आया होता वो आता तो तब जब मैंने उसे पता बताया होता अपनी सज़ा पूरी करके ढूंढने निकलूंगा उसेभगवान भी अपना दरबार तो कहीं लगाया होगा
सोचा इस सफर में काश तू मेरा हमसफर होता आ रहा हूँ मैं तुझसे मिलने, अब सब्र नही होता अल्लाह नगरी से भगवान नगरी में जाने का रामसेतु या दरया-ए-नील सा कोई तो रास्ता होगा
Written By नाज़िम


